Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.3.155: ‘अहा! आज गुरुपत्नी का व्रत है और मैं बहुत दूर से आया हूँ। ऐसी स्थिति में मैं इन कुण्डलों से उनका सत्कार कैसे कर सकूँगा?’ तब उस पुरुष ने इस प्रकार चिन्ताग्रस्त उत्तंक से कहा -॥155॥ | mahabharat अध्याय 1.3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
अद्य तत् पुण्यकमुपाध्यायान्या दूरं चाहमभ्यागत: स कथं सम्भावयेयमिति तत एनं चिन्तयानमेव स पुरुष उवाच॥ १५५॥
अनुवाद
‘अहा! आज गुरुपत्नी का व्रत है और मैं बहुत दूर से आया हूँ। ऐसी स्थिति में मैं इन कुण्डलों से उनका सत्कार कैसे कर सकूँगा?’ तब उस पुरुष ने इस प्रकार चिन्ताग्रस्त उत्तंक से कहा -॥155॥
'Oh! Today is the holy vow of the Guru's wife and I have come a long way. In such a condition how will I be able to honour her with these earrings?' Then the man said to Uttanka who was in this state of worry -॥ 155॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥