अद्य तत् पुण्यकमुपाध्यायान्या दूरं चाहमभ्यागत: स कथं सम्भावयेयमिति तत एनं चिन्तयानमेव स पुरुष उवाच॥ १५५॥
अनुवाद
‘अहा! आज गुरुपत्नी का व्रत है और मैं बहुत दूर से आया हूँ। ऐसी स्थिति में मैं इन कुण्डलों से उनका सत्कार कैसे कर सकूँगा?’ तब उस पुरुष ने इस प्रकार चिन्ताग्रस्त उत्तंक से कहा -॥155॥
'Oh! Today is the holy vow of the Guru's wife and I have come a long way. In such a condition how will I be able to honour her with these earrings?' Then the man said to Uttanka who was in this state of worry -॥ 155॥