श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 154
 
 
श्लोक  1.3.154 
इमे कुण्डले गृह्णातु भवानिति स ते प्रतिजग्राहोत्तङ्क: प्रतिगृह्य च कुण्डलेऽचिन्तयत्॥ १५४॥
 
 
अनुवाद
‘ब्रह्मन्! आप इन दोनों कुण्डलों को स्वीकार करें।’ उत्तंक ने वे कुण्डल ले लिए। कुण्डल लेकर वे सोचने लगे - 154॥
 
'Brahman! You accept both these earrings.' Uttanka took those earrings. Taking the earring he started thinking - 154॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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