श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 152
 
 
श्लोक  1.3.152 
ततोऽश्वस्यापानमधमत् ततोऽश्वाद्धम्यमानात् सर्वस्रोतोभ्य: पावकार्चिष: सधूमा निष्पेतु:॥ १५२॥
 
 
अनुवाद
यह सुनकर उत्तंक ने घोड़े की गुदा में फूंक मारी, जिससे घोड़े के शरीर के समस्त रोमछिद्रों से धुएँ सहित अग्नि की लपटें निकलने लगीं ॥152॥
 
Hearing this, Uttanka blew into the horse's anus. Due to this, flames of fire along with smoke started coming out from all the pores of the horse's body.॥ 152॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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