श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 151
 
 
श्लोक  1.3.151 
नागा मे वशमीयुरिति स चैनं पुरुष: पुनरुवाच एतमश्वमपाने धमस्वेति॥ १५१॥
 
 
अनुवाद
'सभी सर्प मेरे अधीन हो जाएँ' ऐसा कहकर उस पुरुष ने पुनः उत्तंक से कहा, 'इस घोड़े की गुदा में फूँक मारो।' 151.
 
On his saying, 'Let all serpents submit themselves to me,' the man again said to Uttanka, 'Blow into the anus of this horse.' 151.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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