श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 150
 
 
श्लोक  1.3.150 
तत: स एनं पुरुष: प्राह प्रीतोऽस्मि तेऽहमनेन स्तोत्रेण किं ते प्रियं करवाणीति स तमुवाच॥ १५०॥
 
 
अनुवाद
तब उस पुरुष ने उत्तंक से कहा- ‘ब्रह्मन्! मैं आपकी इस प्रार्थना से अत्यन्त प्रसन्न हूँ। आप मुझे बताइए कि मुझे आपका कौन-सा प्रिय कार्य करना चाहिए?’ यह सुनकर उत्तंक ने कहा- ॥150॥
 
Then that man said to Uttanka- 'Brahman! I am very pleased with this prayer of yours. Tell me, which of your favourite tasks should I do?' Hearing this Uttanka said-॥ 150॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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