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mahabharat 1.3.15: राजा ने सबसे पहले ऋषि को प्रणाम किया और कहा, 'हे प्रभु! आपका पुत्र सोमश्रवा मेरा पुरोहित हो।'   |   mahabharat अध्याय 1.3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 15
 
 
श्लोक  1.3.15 
स नमस्कृत्य तमृषिमुवाच भगवन्नयं तव पुत्रो मम पुरोहितोऽस्त्विति॥ १५॥
 
 
अनुवाद
राजा ने सबसे पहले ऋषि को प्रणाम किया और कहा, 'हे प्रभु! आपका पुत्र सोमश्रवा मेरा पुरोहित हो।'
 
The king first bowed to the sage and said, 'O Lord! May your son Somashrava be my priest.'
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)