श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 148-149
 
 
श्लोक  1.3.148-149 
वज्रस्य भर्ता भुवनस्य गोप्ता
वृत्रस्य हन्ता नमुचेर्निहन्ता।
कृष्णे वसानो वसने महात्मा
सत्यानृते यो विविनक्ति लोके॥ १४८॥
यो वाजिनं गर्भमपां पुराणं
वैश्वानरं वाहनमभ्युपैति।
नमोऽस्तु तस्मै जगदीश्वराय
लोकत्रयेशाय पुरन्दराय॥ १४९॥
 
 
अनुवाद
मैं उन महात्मा पुरन्दर को नमस्कार करता हूँ, जो वज्र धारण करते हैं और तीनों लोकों की रक्षा करते हैं, जिन्होंने वृत्रासुर और नमुचि नामक राक्षस का वध किया है, जो दो काले वस्त्र धारण करते हैं और संसार में सत्य-असत्य का भेद करते हैं, जो जल से प्रकट हुए प्राचीन वैश्वानर घोड़े को अपना वाहन बनाकर उस पर सवार रहते हैं और जो तीनों लोकों के अधिपति हैं ॥148-149॥
 
I salute that great soul Purandar, who holds the thunderbolt and protects the three worlds, who killed Vritraasura and the demon Namuchi, who wears two black clothes and discriminates between truth and falsehood in the world, who rides on the ancient Vaishwanara horse that appeared from water as his vehicle, and who is the ruler of the three worlds. ॥148-149॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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