श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 147
 
 
श्लोक  1.3.147 
तन्त्रं चेदं विश्वरूपे युवत्यौ
वयतस्तन्तून् सततं वर्तयन्त्यौ।
कृष्णान् सितांश्चैव विवर्तयन्त्यौ
भूतान्यजस्रं भुवनानि चैव॥ १४७॥
 
 
अनुवाद
वे दोनों युवतियाँ, जिनका स्वरूप यह सम्पूर्ण जगत है, काले और सफेद धागों को इधर-उधर घुमाकर निरन्तर इस कामरूपी जाल को बुन रही हैं और वे ही सम्पूर्ण प्राणियों और सम्पूर्ण लोकों को निरन्तर नियंत्रित करने वाली हैं ॥147॥
 
The two maidens, whose form is this entire universe, are constantly weaving this web of desire by moving the black and white threads here and there and they are the ones who continuously control all beings and all the worlds. ॥147॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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