श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 146
 
 
श्लोक  1.3.146 
त्रीण्यर्पितान्यत्र शतानि मध्ये
षष्टिश्च नित्यं चरति ध्रुवेऽस्मिन्।
चक्रे चतुर्विंशतिपर्वयोगे
षड् वै कुमारा: परिवर्तयन्ति॥ १४६॥
 
 
अनुवाद
यह अविनाशी कालचक्र निरन्तर घूम रहा है। इसके भीतर तीन सौ साठ चक्र, चौबीस पर्व हैं और इस चक्र को छह कुमार घुमा रहे हैं॥146॥
 
This imperishable wheel of time is constantly moving. Within it there are three hundred and sixty wheels, twenty four festivals and this wheel is being revolved by six Kumaras.॥ 146॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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