| श्री महाभारत » पर्व 1: आदि पर्व » अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना » श्लोक 144 |
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| | | | श्लोक 1.3.144  | | एवं स्तुवन्नपि नागान् यदा ते कुण्डले नालभत तदापश्यत् स्त्रियौ तन्त्रे अधिरोप्य सुवेमे पटं वयन्त्यौ। तस्मिंस्तन्त्रे कृष्णा: सिताश्च तन्तवश्चक्रं चापश्यद् द्वादशारं षड्भिः कुमारै: परिवर्त्यमानं पुरुषं चापश्यदश्वं च दर्शनीयम्॥ १४४॥ स तान् सर्वांस्तुष्टाव एभिर्मन्त्रवदेव श्लोकै:॥ १४५॥ | | | | | | अनुवाद | | इस प्रकार सर्पों की स्तुति करने पर भी जब वे वे दोनों कुण्डल न पा सके, तब उन्होंने वहाँ दो स्त्रियों को देखा जो ताने में धागा डालकर सुन्दर करघे पर वस्त्र बुन रही थीं। उस ताने में उत्तंक मुनि ने काले और सफेद दो प्रकार के धागे तथा बारह आरों वाला एक चक्र देखा, जिसे छह कुमार घुमा रहे थे। वहाँ उन्होंने एक महापुरुष को भी देखा। उसके साथ एक सुन्दर घोड़ा भी था। उत्तंक ने उसकी स्तुति इन मन्त्ररूपी श्लोकों से की- ॥144-145॥ | | | | When he could not get those two earrings even after praising the snakes in this manner, he saw two women there who were weaving clothes on a beautiful loom by placing a thread on the warp. In that warp Uttanka Muni saw two types of threads, black and white, and a wheel with twelve spokes which were being turned by six Kumaras. There he also saw a great man. Along with him was a beautiful horse. Uttanka praised him with these mantra-like shlokas-॥144-145॥ | | ✨ ai-generated | | |
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