श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 143
 
 
श्लोक  1.3.143 
एवं स्तुत्वा स विप्रर्षिरुत्तङ्को भुजगोत्तमान्।
नैव ते कुण्डले लेभे ततश्चिन्तामुपागमत्॥ १४३॥
 
 
अनुवाद
जब ब्रह्मर्षि उत्तंक उन उत्तम नागोंकी इस प्रकार स्तुति करनेपर भी उन कुण्डलोंको न पा सके, तब वे अत्यन्त चिन्तित हो गये ॥143॥
 
When Brahmarishi Uttank could not find those earrings even after praising those excellent serpents in this manner, he became very worried. ॥143॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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