श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 136
 
 
श्लोक  1.3.136 
बहूनि नागवेश्मानि गङ्गायास्तीर उत्तरे।
तत्रस्थानपि संस्तौमि महत: पन्नगानहम्॥ १३६॥
 
 
अनुवाद
गंगाजी के उत्तर तट पर बहुत से नागों के घर हैं; वहाँ रहने वाले बड़े-बड़े नागों की भी मैं प्रशंसा करता हूँ ॥136॥
 
On the northern bank of the Ganges are the homes of many serpents; I also praise the large serpents that live there. ॥ 136॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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