श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 135
 
 
श्लोक  1.3.135 
सुरूपा बहुरूपाश्च तथा कल्माषकुण्डला:।
आदित्यवन्नाकपृष्ठे रेजुरैरावतोद्भवा:॥ १३५॥
 
 
अनुवाद
ऐरावत कुल में उत्पन्न होने वाले नागों में बहुत से सुन्दर प्राणी हैं, उनके अनेक रूप हैं, वे विचित्र कुण्डल धारण करते हैं और वे आकाश में सूर्यदेव की भाँति स्वर्ग में चमकते हैं ॥135॥
 
Among the serpents born in the Airavata clan, there are many beautiful creatures, they have many forms, they wear strange earrings and they shine in the heaven like the Sun God in the sky. ॥135॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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