श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 132
 
 
श्लोक  1.3.132 
गच्छास्य ब्राह्मणस्य साहाय्यं कुरुष्वेति। अथ वज्रं दण्डकाष्ठमनुप्रविश्य तद् बिलमदारयत्॥ १३२॥
 
 
अनुवाद
उसने वज्र से कहा, ‘जाओ और इस ब्राह्मण की सहायता करो।’ तब वज्र ने लकड़ी में प्रवेश करके छेद कर दिया (पाताल लोक जाने का मार्ग बना दिया)।॥132॥
 
He said to the Vajra, 'Go and help this Brahmin.' Then the Vajra entered the wood of the stick and tore apart the hole (creating a path to go to the netherworld).॥132॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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