श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  1.3.13 
तत्र कश्चिदृषिरासांचक्रे श्रुतश्रवा नाम। तस्य तपस्यभिरत: पुत्र आस्ते सोमश्रवा नाम॥ १३॥
 
 
अनुवाद
उस आश्रम में श्रुतश्रवा नामक एक प्रसिद्ध ऋषि रहते थे। उनके पुत्र का नाम सोमश्रवा था। सोमश्रवा सदैव तपस्या में लीन रहते थे।
 
A famous sage named Shrutashrava lived in that ashram. His son's name was Somashrava. Somashrava was always engaged in penance. 13.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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