| श्री महाभारत » पर्व 1: आदि पर्व » अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना » श्लोक 127 |
|
| | | | श्लोक 1.3.127  | | अथोत्तङ्कस्ते कुण्डले संन्यस्य भूमावुदकार्थं प्रचक्रमे। एतस्मिन्नन्तरे स क्षपणकस्त्वरमाण उपसृत्य ते कुण्डले गृहीत्वा प्राद्रवत्॥ १२७॥ | | | | | | अनुवाद | | कुछ दूर जाकर उत्तंक ने उन कुण्डलों को एक जलाशय के किनारे भूमि पर रख दिया और स्वयं जल-संबंधी क्रियाएँ (शौच, स्नान, आचमन, संध्या तर्पण आदि) करने लगे। इतने में ही वह बड़ी तेजी से वहाँ आया और दोनों कुण्डलों को छीन लिया। 127॥ | | | | After going some distance, Uttanka placed those earrings on the ground on the bank of a reservoir and himself started performing water related activities (defecation, bathing, achaman, evening tarpan etc.). Meanwhile he came there with great haste and snatched away both the earrings. 127॥ | | ✨ ai-generated | | |
|
|