श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 126
 
 
श्लोक  1.3.126 
साधयामस्तावदित्युक्त्वा प्रातिष्ठतोत्तङ्कस्ते कुण्डले गृहीत्वा सोऽपश्यदथ पथि नग्नं क्षपणकमागच्छन्तं मुहुर्मुहुर्दृश्यमानमदृश्यमानं च॥ १२६॥
 
 
अनुवाद
‘अब हम अपना कार्य समाप्त करते हैं ।’ ऐसा कहकर उत्तंक ने दोनों कुण्डल ले लिए और वहाँ से चले गए । मार्ग में उन्होंने एक नग्न क्षपणक को अपने पीछे आते देखा जो बार-बार प्रकट और लुप्त हो रहा था ॥126॥
 
'Now we are finishing our work.' Saying this Uttanka took both the earrings and left from there. On the way he saw a naked Kshapanaka following him who kept appearing and disappearing again and again.॥ 126॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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