| श्री महाभारत » पर्व 1: आदि पर्व » अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना » श्लोक 124 |
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| | | | श्लोक 1.3.124  | | तदेवं गते न शक्तोऽहं तीक्ष्णहृदयत्वात् तं शापमन्यथा कर्तुं गम्यतामिति। तमुत्तङ्क: प्रत्युवाच भवताहमन्नस्याशुचिभावमालक्ष्य प्रत्यनुनीत: प्राक् च तेऽभिहितम्॥ १२४॥ यस्माददुष्टमन्नं दूषयसि तस्मादनपत्यो भविष्यसीति। दुष्टे चान्ने नैष मम शापो भविष्यतीति॥ १२५॥ | | | | | | अनुवाद | | ‘अतः ऐसी स्थिति में कठोर हृदय होने के कारण मैं उस शाप को बदलने में असमर्थ हूँ। अतः आप जाइए।’ तब उत्तंक ने कहा - ‘राजन्! आपने अन्न की अशुद्धता देखकर मुझसे क्षमा याचना की है, किन्तु पहले आपने कहा था कि ‘आप शुद्ध अन्न को अशुद्ध कह रहे हैं, इसलिए आप सन्तानहीन होंगे।’ इसके बाद यह सिद्ध हो गया कि अन्न अशुद्ध था, अतः आपका शाप मुझ पर लागू नहीं होगा।’॥124-125॥ | | | | 'Therefore, in such a situation, being hard-hearted, I am unable to change that curse. Therefore, you go.' Then Uttanka said - 'King! Seeing the impurity of the food, you have begged me for forgiveness, but earlier you had said that 'you are calling pure food impure, that is why you will be childless.' After this, it was proved that the food was impure, hence your curse will not apply to me.'॥ 124-125॥ | | ✨ ai-generated | | |
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