Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.3.122-123: यह सुनकर पौष्यजी ने उत्तंक से कहा—‘मैं शाप को पलटने में असमर्थ हूँ, मेरा क्रोध अभी भी शांत नहीं हो रहा है। क्या तुम नहीं जानते कि ब्राह्मण का हृदय मक्खन के समान कोमल और शीघ्र पिघलने वाला होता है? केवल उसकी वाणी ही तीक्ष्ण छुरी के समान प्रभाव वाली होती है। किन्तु क्षत्रिय के लिए ये दोनों बातें विपरीत हैं। उसकी वाणी मक्खन के समान कोमल होती है, किन्तु उसका हृदय तीक्ष्ण छुरी के समान तीक्ष्ण होता है।॥122-123॥ | mahabharat अध्याय 1.3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
तं पौष्य: प्रत्युवाच न चाहं शक्त: शापं प्रत्यादातुं न हि मे मन्युरद्याप्युपशमं गच्छति किं चैतद् भवता न ज्ञायते यथा—॥ १२२॥
नवनीतं हृदयं ब्राह्मणस्य
वाचि क्षुरो निहितस्तीक्ष्णधार:।
तदुभयमेतद् विपरीतं क्षत्रियस्य
वाङ्नवनीतं हृदयं तीक्ष्णधारम्। इति॥ १२३॥
अनुवाद
यह सुनकर पौष्यजी ने उत्तंक से कहा—‘मैं शाप को पलटने में असमर्थ हूँ, मेरा क्रोध अभी भी शांत नहीं हो रहा है। क्या तुम नहीं जानते कि ब्राह्मण का हृदय मक्खन के समान कोमल और शीघ्र पिघलने वाला होता है? केवल उसकी वाणी ही तीक्ष्ण छुरी के समान प्रभाव वाली होती है। किन्तु क्षत्रिय के लिए ये दोनों बातें विपरीत हैं। उसकी वाणी मक्खन के समान कोमल होती है, किन्तु उसका हृदय तीक्ष्ण छुरी के समान तीक्ष्ण होता है।॥122-123॥
Hearing this, Pauṣya said to Uttanka—‘I am unable to reverse the curse, my anger is still not subsiding. Don't you know that the heart of a Brahmin is as soft as butter and melts quickly? Only his speech has the effect of a sharp knife. But both these things are opposite for a Kshatriya. His speech is as soft as butter, but his heart is as sharp as a sharp knife.॥122-123॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥