श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 121
 
 
श्लोक  1.3.121 
न मृषा ब्रवीमि भूत्वा त्वमन्धो न चिरादनन्धो भविष्यसीति। ममापि शापो भवता दत्तो न भवेदिति॥ १२१॥
 
 
अनुवाद
'राजन्! मैं झूठ नहीं बोल रहा हूँ। पहले आप अंधे हो जाएँगे और फिर कुछ दिनों में इस दोष से मुक्त हो जाएँगे। अब आप भी ऐसा प्रयत्न करें कि आपका दिया हुआ शाप मुझ पर लागू न हो।'॥121॥
 
‘King! I do not lie. You will first become blind and then in a few days you will be free from this defect. Now you should also try such that the curse given by you does not apply to me.'॥ 121॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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