श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 120
 
 
श्लोक  1.3.120 
भगवन्नेतदज्ञानादन्नं सकेशमुपाहृतं शीतं तत् क्षामये भवन्तं न भवेयमन्ध इति तमुत्तङ्क: प्रत्युवाच॥ १२०॥
 
 
अनुवाद
'प्रभो! यह रोएँदार और ठंडा भोजन अनजाने में ही आपके पास लाया गया है। अतः मैं इस अपराध के लिए क्षमा माँगता हूँ। मुझ पर ऐसी कृपा कीजिए कि मैं अंधा न हो जाऊँ।' तब उत्तंक ने राजा से कहा-॥120॥
 
'Lord! This hairy and cold food has been brought to you unknowingly. So I ask for forgiveness for this crime. Kindly show me such kindness that I do not become blind.' Then Uttanka said to the king-॥120॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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