vedamrit
Reset
Home
ग्रन्थ
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
श्रीमद् भगवद गीता
______________
श्री विष्णु पुराण
श्रीमद् भागवतम
______________
श्रीचैतन्य भागवत
वैष्णव भजन
About
Contact
श्री महाभारत
»
पर्व 1: आदि पर्व
»
अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना
»
श्लोक 12
श्लोक
1.3.12
स कदाचिन्मृगयां गत: पारीक्षितो जनमेजय: कस्मिंश्चित् स्वविषय आश्रममपश्यत्॥ १२॥
अनुवाद
एक दिन परीक्षित के पुत्र जनमेजय आखेट के लिए वन में गए और वहाँ उन्होंने एक आश्रम देखा, जो उनके राज्य के किसी क्षेत्र में था ॥12॥
One day Parikshit's son Janmejay went to the forest for hunting. There he saw an ashram, which existed in some region of his kingdom. 12॥
✨ ai-generated
Connect Form
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
© 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd