श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 118
 
 
श्लोक  1.3.118 
न युक्तं भवतान्नमशुचि दत्त्वा प्रतिशापं दातुं तस्मादन्नमेव प्रत्यक्षीकुरु। तत: पौष्यस्तदन्नमशुचि दृष्ट्वा तस्याशुचिभावमपरोक्षयामास॥ ११८॥
 
 
अनुवाद
‘महाराज! अशुद्ध अन्न देकर फिर शाप देना उचित नहीं है। अतः पहले अन्न को देख लें।’ तब पौष्यजी ने अशुद्ध अन्न को देखकर उसकी अशुद्धता का कारण जान लिया॥118॥
 
‘Maharaj! It is not proper for you to give impure food and then curse in return. So first see the food itself.’ Then Pauṣya, after seeing the impure food, found out the reason for its impurity.॥ 118॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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