श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 117
 
 
श्लोक  1.3.117 
तं पौष्य: प्रत्युवाच यस्मात्त्वमप्यदुष्टमन्नं दूषयसि तस्मात्त्वमनपत्यो भविष्यसीति तमुत्तङ्क: प्रत्युवाच॥ ११७॥
 
 
अनुवाद
तब पौषय ने उसे शाप देकर कहा कि, ‘तू शुद्ध अन्न को अशुद्ध कह रहा है, अतः तू भी पुत्रहीन हो जाएगा।’ तब राजा उत्तंक ने पौषय से कहा -॥117॥
 
Then Paushaya cursed him in return and said, 'You are calling the pure food impure, hence you too will become childless.' Then King Uttanka said to Paushaya -॥ 117॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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