श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 113
 
 
श्लोक  1.3.113 
स एवमुक्त्वा तां क्षत्रियामामन्त्र्य पौष्यसकाशमागच्छत् । आह चैनं भो: पौष्य प्रीतोऽस्मीति तमुत्तङ्कं पौष्य: प्रत्युवाच॥ ११३॥
 
 
अनुवाद
रानी से ऐसा कहकर और उनकी अनुमति लेकर उत्तंक राजा पौष्य के पास आये और बोले - ‘महाराज पौष्य! मैं बहुत प्रसन्न हूँ (और आपसे विदा लेना चाहता हूँ)।’ यह सुनकर पौष्य ने उत्तंक से कहा -॥113॥
 
Having said this to the Queen and taking her permission, Uttanka came to King Paushaya and said - 'Maharaja Paushaya! I am very happy (and wish to take leave from you).' On hearing this, Paushaya said to Uttanka -॥ 113॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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