श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 111
 
 
श्लोक  1.3.111 
स तामुवाचैते कुण्डले गुर्वर्थं मे भिक्षिते दातुमर्हसीति। सा प्रीता तेन तस्य सद्भावेन पात्रमयमनतिक्रमणीयश्चेति मत्वा ते कुण्डलेऽवमुच्यास्मै प्रायच्छदाह तक्षको नागराज: सुभृशं प्रार्थयत्यप्रमत्तो नेतुमर्हसीति॥ १११॥
 
 
अनुवाद
उत्तंक ने रानी से कहा, 'देवि! मैंने अपने गुरु के लिए आपके दो कुण्डल मांगे हैं। कृपया उन्हें मुझे दे दीजिए।' रानी उत्तंक की सद्भावना (गुरुभक्ति) से बहुत प्रसन्न हुईं। 'यह एक योग्य ब्राह्मण है, इसे निराश नहीं लौटाना चाहिए' ऐसा सोचकर उन्होंने अपने दोनों कुण्डल उतारकर उसे दे दिए और उससे कहा, 'ब्राह्मण! सर्पराज तक्षक इन कुण्डलों को प्राप्त करने के लिए बहुत प्रयत्न कर रहा है। अतः इन्हें लेते समय तुम्हें सावधानी बरतनी चाहिए।'॥111॥
 
Uttanka said to the queen, 'Devi! I have requested your two earrings for my Guru. Please give them to me.' The queen was very pleased with Uttanka's goodwill (devotion to the Guru). Thinking that 'this is a deserving Brahmin, he should not be sent back disappointed', she took off her two earrings and gave them to him and said to him, 'Brahmin! King of snakes Takshak is trying very hard to get these earrings. Therefore, you should be careful while taking them.'॥111॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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