श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 110
 
 
श्लोक  1.3.110 
ततस्तां क्षत्रियामपश्यत् , सा च दृष्ट्वैवोत्तङ्कं प्रत्युत्थायाभिवाद्योवाच स्वागतं ते भगवन्नाज्ञापय किं करवाणीति॥ ११०॥
 
 
अनुवाद
फिर उसने क्षत्राणी को देखा। उत्तंक को देखकर रानी उठ खड़ी हुई और उन्हें प्रणाम करके बोली - 'प्रभो! आपका स्वागत है, आज्ञा करें, मैं आपकी क्या सेवा कर सकती हूँ?'॥110॥
 
Then he saw the Kshatranee. The queen stood up on seeing Uttanka and said after saluting him - 'Lord! You are welcome, please order, what service can I do for you?'॥ 110॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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