श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  1.3.11 
स तस्मिन् सत्रे समाप्ते हास्तिनपुरं प्रत्येत्य पुरोहितमनुरूपमन्विच्छमान: परं यत्नमकरोद् यो मे पापकृत्यां शमयेदिति॥ ११॥
 
 
अनुवाद
उस सत्र के समापन के पश्चात वे हस्तिनापुर आये और इस प्रयोजन के लिए एक योग्य पुरोहित की खोज करने लगे। पुरोहित को खोजने का उद्देश्य यह था कि वह अपने इस शाप रूपी पाप कर्म (जो बल, आयु और जीवन का नाश करने वाला है) को शांत कर दे।
 
After the completion of that session, he came to Hastinapur and started looking for a suitable priest for this purpose. The purpose of finding the priest was that he should calm down this sinful act of his in the form of a curse (which is going to destroy strength, age and life).
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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