श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 108
 
 
श्लोक  1.3.108 
अथैवमुक्त उत्तङ्क: स्मृत्वोवाचास्ति खलु मयोत्थितेनोपस्पृष्टं गच्छतां चेति। तं पौष्य: प्रत्युवाच—एष ते व्यतिक्रमो नोत्थितेनोपस्पृष्टं भवतीति शीघ्रं गच्छता चेति॥ १०८॥
 
 
अनुवाद
उनकी यह बात सुनकर उत्तंक को स्मरण आया और उन्होंने कहा, ‘हाँ, मैं अवश्य ही अशुद्ध हूँ। यहाँ भ्रमण करते समय मैंने खड़े-खड़े और चलते हुए कुल्ला किया है।’ तब पौष ने उनसे कहा, ‘ब्राह्मण! यहीं तुमने नियम का उल्लंघन किया है। खड़े होकर और शीघ्रता से चलते हुए किया गया सुंघाना व्यर्थ है।’॥108॥
 
On hearing him say this, Uttanka remembered and said, 'Yes, I am definitely impure. While travelling here, I have rinsed my mouth while standing and walking.' Then Pausha said to him, 'Brahmin! This is where you have violated the rules. Snuff done while standing and walking quickly is equal to nothing.'॥108॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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