| श्री महाभारत » पर्व 1: आदि पर्व » अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना » श्लोक 107 |
|
| | | | श्लोक 1.3.107  | | स एवमुक्त: पौष्य: क्षणमात्रं विमृश्योत्तङ्कं प्रत्युवाच नियतं भवानुच्छिष्ट: स्मर तावन्न हि सा क्षत्रिया उच्छिष्टेनाशुचिना शक्या द्रष्टुं पतिव्रतात्वात् सैषा नाशुचेर्दर्शनमुपैतीति॥ १०७॥ | | | | | | अनुवाद | | उत्तंक के ऐसा कहने पर पौषेय ने क्षण भर विचार करके उसे उत्तर दिया - 'तुम निश्चय ही मिथ्यावादी हो, स्मरण रखो, क्योंकि मेरी क्षत्राणी पतिव्रता होने के कारण अपवित्र या अशुद्ध मनुष्य को दिखाई नहीं देती। तुम भी अपवित्र हो, इसीलिए उसे नहीं देख सकते।'॥107॥ | | | | When Uttanka said this, Paushaya thought for a moment and replied to him - 'You are definitely a liar, please remember, because my Kshatrani cannot be seen by an impure or unclean person because she is faithful to her husband. You are impure because you are impure, that is why you are not able to see her.'॥107॥ | | ✨ ai-generated | | |
|
|