श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 106
 
 
श्लोक  1.3.106 
स पौष्यं पुनरुवाच न युक्तं भवताहमनृतेनोपचरितुं न हि तेऽन्त:पुरे क्षत्रिया सन्निहिता नैनां पश्यामि॥ १०६॥
 
 
अनुवाद
तब वह पुनः राजा पौष के पास आया और बोला - 'हे राजन! मुझे संतुष्ट करने के लिए झूठ बोलकर मुझे धोखा देना आपके लिए उचित नहीं है। आपके अन्तःपुर में कोई क्षत्राणी नहीं है, क्योंकि मैं उन्हें वहाँ नहीं देखता हूँ।'॥106॥
 
Then he again came to King Pausha and said, 'O King! It is not befitting for you to deceive me by telling lies to satisfy me. There are no Kshatrani in your inner palace, because I do not see them there.'॥106॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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