श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 105
 
 
श्लोक  1.3.105 
तं प्रत्युवाच पौष्य: प्रविश्यान्त:पुरं क्षत्रिया याच्यतामिति। स तेनैवमुक्त: प्रविश्यान्त:पुरं क्षत्रियां नापश्यत्॥ १०५॥
 
 
अनुवाद
यह सुनकर पौष्यजी ने उत्तंक से कहा, ‘हे ब्राह्मण! भीतरी भवन में जाकर उस क्षत्राणी से वे कुण्डल मांग लो।’ राजा की यह बात सुनकर उत्तंक भीतरी भवन में गए, परन्तु उन्हें वहाँ क्षत्राणी दिखाई नहीं दी॥105॥
 
On hearing this Pauṣya said to Uttanka, 'O Brahmin! Go to the inner palace and ask the Kshatranī for those earrings.' On hearing this from the king, Uttanka entered the inner palace, but he did not see the Kshatranī there.॥ 105॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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