श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 104
 
 
श्लोक  1.3.104 
तमुवाच गुर्वर्थं कुण्डलयोरर्थेनाभ्यागतोऽस्मीति। ये वै ते क्षत्रियया पिनद्धे कुण्डले ते भवान् दातुमर्हतीति॥ १०४॥
 
 
अनुवाद
उत्तंक ने पौष्य से कहा, 'हे राजन! मैं गुरुदक्षिणा में आपके पास दो कुण्डल मांगने आया हूँ। कृपया मुझे वही कुण्डल दीजिए जो आपकी क्षत्राणी ने पहने हुए हैं। यह आपके योग्य कार्य है।'॥104॥
 
Uttanka said to Paushaya, 'O King! I have come to you for two earrings as Gurudakshina. Please give me the same earrings that your Kshatranee is wearing. This is a deed worthy of you.'॥104॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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