श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 103
 
 
श्लोक  1.3.103 
अर्थी भवन्तमुपागतोऽस्मीति स एनमभिवाद्योवाच भगवन् पौष्य: खल्वहं किं करवाणीति॥ १०३॥
 
 
अनुवाद
"हे राजन! मैं आपके पास भिखारी बनकर आया हूँ।" राजा ने उन्हें प्रणाम करके कहा - "हे प्रभु! मैं आपका सेवक पौष्य हूँ; आप मुझे बताएँ कि मैं किस आज्ञा का पालन करूँ?"॥103॥
 
"O King! I have come to you as a beggar." The king bowed to him and said - "O Lord! I am your servant Paushya; tell me, which order should I follow?"॥103॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd