श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 102
 
 
श्लोक  1.3.102 
यत्र स क्षत्रिय: पौष्यस्तमुपेत्यासीनमपश्यदुत्तङ्क:। स उत्तङ्कस्तमुपेत्याशीर्भिरभिनन्द्योवाच॥ १०२॥
 
 
अनुवाद
जहाँ क्षत्रिय राजा पौष रहते थे, वहाँ पहुँचकर उत्तंक ने देखा कि राजा सिंहासन पर बैठे हैं। तब उत्तंक उनके पास गए और उन्हें आशीर्वाद देकर प्रसन्न करते हुए बोले - ॥102॥
 
Reaching the place where the Kshatriya king Pausha lived, Uttanka saw that the king was sitting on a throne. Then Uttanka went near him and pleased him with his blessings and said -॥102॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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