Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 1.3.101: उनके पुनः ऐसा कहने पर उत्तंक ने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी बात स्वीकार कर ली और बैल का गोबर और मूत्र खाकर अधीरता के कारण खड़े-खड़े ही कुल्ला कर लिया। फिर वे चले गए॥101॥ | mahabharat अध्याय 1.3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना । mahabharat पर्व 1: आदि पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
स एवमुक्तो बाढमित्युक्त्वा तदा तद् वृषभस्य मूत्रं पुरीषं च भक्षयित्वोत्तङ्क: सम्भ्रमादुत्थित एवाप उपस्पृश्य प्रतस्थे॥ १०१॥
अनुवाद
उनके पुनः ऐसा कहने पर उत्तंक ने 'बहुत अच्छा' कहकर उनकी बात स्वीकार कर ली और बैल का गोबर और मूत्र खाकर अधीरता के कारण खड़े-खड़े ही कुल्ला कर लिया। फिर वे चले गए॥101॥
When he said this again, Uttanka accepted his proposal saying 'very good' and after eating and drinking the bull's dung and urine, he rinsed his mouth while standing due to his impatience. Then they left.॥101॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥