श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 3: जनमेजयको सरमाका शाप, जनमेजयद्वारा सोमश्रवाका पुरोहितके पदपर वरण,आरुणि, उपमन्यु, वेद और उत्तंककी गुरुभक्ति तथा उत्तंकका सर्पयज्ञके लिये जनमेजयको प्रोत्साहन देना  »  श्लोक 100
 
 
श्लोक  1.3.100 
तमाह पुरुषो भूयो भक्षयस्वोत्तङ्क मा विचारयोपाध्यायेनापि ते भक्षितं पूर्वमिति॥ १००॥
 
 
अनुवाद
तब उस पुरुष ने पुनः उससे कहा - 'उत्तंक! इसे खा लो, सोचो मत। तुम्हारे उपाध्याय ने भी इसे पहले खाया था।'
 
Then the man again said to him - 'Uttank! Eat it, don't think. Your Upadhyaya also ate it earlier.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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