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श्लोक 1.29.5  |
सौतिरुवाच
तत: स विप्रो निष्क्रान्तो निषादीसहितस्तदा।
वर्धयित्वा च गरुडमिष्टं देशं जगाम ह॥ ५॥ |
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| अनुवाद |
| उग्रश्रवाजी कहते हैं - उनके ऐसा कहने पर निषादि सहित वह ब्राह्मण गरुड़ के मुख से निकला और उन्हें आशीर्वाद देकर इच्छित देश को चला गया॥5॥ |
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| Ugrasravaji says - On his saying this, the Brahmin along with Nishadi came out of the mouth of Garuda and after blessing them went to the desired country. ॥ 5॥ |
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