श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 29: कश्यपजीका गरुडको हाथी और कछुएके पूर्वजन्मकी कथा सुनाना, गरुडका उन दोनोंको पकड़कर एक दिव्य वटवृक्षकी शाखापर ले जाना और उस शाखाका टूटना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  1.29.5 
सौतिरुवाच
तत: स विप्रो निष्क्रान्तो निषादीसहितस्तदा।
वर्धयित्वा च गरुडमिष्टं देशं जगाम ह॥ ५॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं - उनके ऐसा कहने पर निषादि सहित वह ब्राह्मण गरुड़ के मुख से निकला और उन्हें आशीर्वाद देकर इच्छित देश को चला गया॥5॥
 
Ugrasravaji says - On his saying this, the Brahmin along with Nishadi came out of the mouth of Garuda and after blessing them went to the desired country. ॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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