श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 29: कश्यपजीका गरुडको हाथी और कछुएके पूर्वजन्मकी कथा सुनाना, गरुडका उन दोनोंको पकड़कर एक दिव्य वटवृक्षकी शाखापर ले जाना और उस शाखाका टूटना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  1.29.33 
सौतिरुवाच
इत्युक्त्वा गरुडं सोऽथ माङ्गल्यमकरोत् तदा।
युध्यत: सह देवैस्ते युद्धे भवतु मङ्गलम्॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं - शौनकजी! कश्यपजी ने गरुड़ से यह बात कही और उस समय उनकी कुशलक्षेम की प्रार्थना करते हुए कहा - 'गरुड़! युद्ध में देवताओं के साथ युद्ध करते हुए तुम्हारा कल्याण हो।'
 
Ugrasravaji says - Shaunakji! Kashyapji said this to Garuda and at that time prayed for his well being and said - 'Garuda! May you be blessed while fighting with the gods in the war.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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