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श्लोक 1.29.23  |
शप्तस्त्वेवं सुप्रतीको विभावसुमथाब्रवीत् ।
त्वमप्यन्तर्जलचर: कच्छप: सम्भविष्यसि॥ २३॥ |
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| अनुवाद |
| इस प्रकार शाप देकर सुप्रतीक ने विभावसु से कहा, 'तुम भी जल में विचरण करने वाले कछुआ बनोगे।' |
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| Thus cursed, Suprateek said to Vibhavasu, 'You too will become a tortoise roaming in the water.' |
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