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श्लोक 1.29.22  |
नियन्तुं न हि शक्यस्त्वं भेदतो धनमिच्छसि।
यस्मात् तस्मात् सुप्रतीक हस्तित्वं समवाप्स्यसि॥ २२॥ |
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| अनुवाद |
| 'सुप्रतीक! तुम पर नियंत्रण करना असम्भव हो रहा है और तुम भेदभाव के कारण धन का बँटवारा करना चाहते हो, इसीलिए तुम्हें हाथी की योनि में जन्म लेना पड़ेगा।' |
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| 'Supratik! It is becoming impossible to control you and because of discrimination you want to divide the wealth, that is why you will have to take birth in the womb of an elephant.' |
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