श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 29: कश्यपजीका गरुडको हाथी और कछुएके पूर्वजन्मकी कथा सुनाना, गरुडका उन दोनोंको पकड़कर एक दिव्य वटवृक्षकी शाखापर ले जाना और उस शाखाका टूटना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  1.29.20 
विदित्वा चापरे भिन्नानन्तरेषु पतन्त्यथ।
भिन्नानामतुलो नाश: क्षिप्रमेव प्रवर्तते॥ २०॥
 
 
अनुवाद
दूसरे लोग उनमें फूट जानकर उनमें दोष ढूँढ़ने का प्रयत्न करते हैं और जब वे दोष खोज लेते हैं, तब वे स्वयं ही उनमें शत्रुता बढ़ाने के लिए हस्तक्षेप करते हैं। अतः जो लोग आपस में फूट डालते हैं, उनका ऐसा नाश होता है कि कहीं कोई तुलना ही नहीं रह जाती।॥20॥
 
‘Other people, knowing that there is a division among them, try to find faults in them and when they find faults, they themselves intervene to increase the enmity between them. Therefore, those who separate and create divisions among themselves, are destroyed in such a way that there is no comparison anywhere.॥ 20॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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