श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 29: कश्यपजीका गरुडको हाथी और कछुएके पूर्वजन्मकी कथा सुनाना, गरुडका उन दोनोंको पकड़कर एक दिव्य वटवृक्षकी शाखापर ले जाना और उस शाखाका टूटना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  1.29.19 
तत: स्वार्थपरान् मूढान् पृथग्भूतान् स्वकैर्धनै:।
विदित्वा भेदयन्त्येतानमित्रा मित्ररूपिण:॥ १९॥
 
 
अनुवाद
जब वे स्वार्थी, मूर्ख मनुष्य धन लेकर विदा हो जाते हैं, तब उनकी स्थिति जानकर उनके शत्रु भी मित्र के वेश में आकर उनमें भेद उत्पन्न करते रहते हैं॥19॥
 
When those selfish, foolish people part ways with their wealth, then knowing their condition even their enemies come in the guise of friends and keep creating differences between them.॥ 19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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