श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 29: कश्यपजीका गरुडको हाथी और कछुएके पूर्वजन्मकी कथा सुनाना, गरुडका उन दोनोंको पकड़कर एक दिव्य वटवृक्षकी शाखापर ले जाना और उस शाखाका टूटना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  1.29.18 
विभागं बहवो मोहात् कर्तुमिच्छन्ति नित्यश:।
ततो विभक्तास्त्वन्योन्यं विक्रुध्यन्तेऽर्थमोहिता:॥ १८॥
 
 
अनुवाद
‘भाई! बहुत से लोग मोहवश सदैव अपने धन का बँटवारा करना चाहते हैं। फिर जब बँटवारा हो जाता है, तब वे धन के मोहवश एक-दूसरे के प्रति द्वेष रखते हैं और एक-दूसरे पर क्रोध करते हैं॥18॥
 
‘Brother! Many people, due to their attachment, always wish to divide their wealth. Then, when the division is done, they become hostile towards each other and get angry with each other due to their attachment to wealth.॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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