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श्लोक 1.29.17  |
विभागं कीर्तयत्येव सुप्रतीको हि नित्यश:।
अथाब्रवीच्च तं भ्राता सुप्रतीकं विभावसु:॥ १७॥ |
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| अनुवाद |
| सुप्रतीक प्रतिदिन बँटवारे के लिए आग्रह करता था। तब एक दिन बड़े भाई विभावसु ने सुप्रतीक से कहा-॥17॥ |
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| Supratik used to insist for division everyday. Then one day the elder brother Vibhavasu said to Supratik-॥ 17॥ |
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