श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 29: कश्यपजीका गरुडको हाथी और कछुएके पूर्वजन्मकी कथा सुनाना, गरुडका उन दोनोंको पकड़कर एक दिव्य वटवृक्षकी शाखापर ले जाना और उस शाखाका टूटना  »  श्लोक 14-15h
 
 
श्लोक  1.29.14-15h 
यत्र कूर्माग्रजं हस्ती सदा कर्षत्यवाङ्मुख:।
तयोर्जन्मान्तरे वैरं सम्प्रवक्ष्याम्यशेषत:॥ १४॥
तन्मे तत्त्वं निबोधत्स्व यत्प्रमाणौ च तावुभौ।
 
 
अनुवाद
वहाँ एक हाथी, जिसका मुँह नीचे की ओर है, एक कछुए को अपनी सूँड़ से पकड़कर सदैव खींचता रहता है। वह कछुआ पूर्वजन्म में उसका बड़ा भाई था। उन दोनों में पूर्वजन्मों से ही शत्रुता है। उन दोनों में यह शत्रुता क्यों और कैसे उत्पन्न हुई तथा उनके शरीर की लंबाई, चौड़ाई और ऊँचाई कितनी है, यह सब मैं तुम्हें विस्तारपूर्वक बताता हूँ। तुम ध्यानपूर्वक सुनो॥14 1/2॥
 
There an elephant with its face downwards is always pulling a tortoise by holding it with its trunk. That tortoise was its elder brother in its previous birth. The two have a rivalry from their previous births. Why and how did this rivalry arise between them and what is the length, breadth and height of their bodies, I am telling you all these things in detail. You listen carefully.॥14 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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