श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 29: कश्यपजीका गरुडको हाथी और कछुएके पूर्वजन्मकी कथा सुनाना, गरुडका उन दोनोंको पकड़कर एक दिव्य वटवृक्षकी शाखापर ले जाना और उस शाखाका टूटना  »  श्लोक 1-2
 
 
श्लोक  1.29.1-2 
सौतिरुवाच
तस्य कण्ठमनुप्राप्तो ब्राह्मण: सह भार्यया।
दहन् दीप्त इवाङ्गारस्तमुवाचान्तरिक्षग:॥ १॥
द्विजोत्तम विनिर्गच्छ तूर्णमास्यादपावृतात् ।
न हि मे ब्राह्मणो वध्य: पापेष्वपि रत: सदा॥ २॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं - निषादों के साथ एक ब्राह्मण भी अपनी पत्नी सहित गरुड़ के कंठ में प्रविष्ट हो गया। वह जलते हुए अंगारे के समान जलने लगा। तब आकाशगामी गरुड़ ने उस ब्राह्मण से कहा - 'हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! तुम शीघ्र ही मेरे खुले हुए मुख से निकल जाओ। ब्राह्मण यदि पापी भी हो, तो भी वह मेरे लिए सर्वदा अक्षय है।'॥1-2॥
 
Ugrashravaji says - Along with the Nishads, a Brahmin with his wife also entered the throat of Garuda. He started burning like a burning ember. Then the sky-traveling Garuda said to that Brahmin - 'O best of the Brahmins! You should quickly get out of my open mouth. Even if the Brahmin is sinful, he is always inviolable for me.'॥ 1-2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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