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mahabharat 1.28.4: क्रोधी ब्राह्मण अग्नि, सूर्य, विष और शस्त्रों के समान भयंकर होता है। ब्राह्मण को समस्त प्राणियों का गुरु कहा गया है॥4॥   |   mahabharat अध्याय 1.28: गरुडका अमृतके लिये जाना और अपनी माताकी आज्ञाके अनुसार निषादोंका भक्षण करना   ।   mahabharat पर्व 1: आदि पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 28: गरुडका अमृतके लिये जाना और अपनी माताकी आज्ञाके अनुसार निषादोंका भक्षण करना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  1.28.4 
अग्निरर्को विषं शस्त्रं विप्रो भवति कोपित:।
गुरुर्हि सर्वभूतानां ब्राह्मण: परिकीर्तित:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
क्रोधी ब्राह्मण अग्नि, सूर्य, विष और शस्त्रों के समान भयंकर होता है। ब्राह्मण को समस्त प्राणियों का गुरु कहा गया है॥4॥
 
An enraged Brahmin is as dreadful as fire, sun, poison and weapons. Brahmins are said to be the teacher of all living beings.॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)