श्री महाभारत  »  पर्व 1: आदि पर्व  »  अध्याय 28: गरुडका अमृतके लिये जाना और अपनी माताकी आज्ञाके अनुसार निषादोंका भक्षण करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  1.28.17 
सौतिरुवाच
तत: स मातुर्वचनं निशम्य
वितत्य पक्षौ नभ उत्पपात।
ततो निषादान् बलवानुपागतो
बुभुक्षित: काल इवान्तकोऽपर:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
उग्रश्रवाजी कहते हैं - शौनकादि महर्षि! माता के वचन सुनकर महाबली गरुड़ पंख फैलाकर आकाश में उड़ गए और क्षुद्र काल अर्थात् दूसरे यमराज के समान उन निषादों के पास पहुँच गए॥17॥
 
Ugrashravaji says – Shaunkadi Maharishi! Hearing the words of the mother, the mighty Garuda spread his wings and flew into the sky and like Khudhatur Kaal or the second Yamraj, he reached those Nishadas. 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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